Thursday, June 5, 2014

पौधरोपण करने खर्च करते हैं खुद की कमाई

जिला मुख्यालय जांजगीर में पौधरोपण करने युवाओं में गजब का जुनून नजर आता है। चार युवाओं ने मिलकर ‘जज्बा फाउंडेषन बनाया, इसके बाद कारवां बढ़ता गया। जज्बा फाउंडेषन के युवाओं ने 3 साल पहले पौधरोपण का यज्ञ शुरू किया। आज इन युवाओं ने 3 हजार से अधिक पौधरोपण कर, पर्यावरण संरक्षण में मिसाल कायम किया है। अहम बात यह है कि पौधरोपण करने के लिए इन युवाओं द्वारा खुद की कमाई का 5 से 10 फीसदी हिस्सा खर्च किया जाता है।
बिगड़ते पर्यावरण से आज हर कोई प्रभावित है, लेकिन पर्यावरण की चिंता बहुत कम लोग करते हैं। इसी माहौल में जांजगीर का ‘जज्बा फाउंडेषन’ के युवाओं द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास की जितनी तारीफ की जाए, कम ही है।
दरअसल, तीन साल पहले जांजगीर के चार युवकों नवनीत राठौर, नरेष पैगवार, ऋषिकेष अग्रवाल, ऋषिकेष उपाध्याय ने पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए ‘जज्बा फाउंडेषन’ बनाया और शहर में पौधरोपण की शुरूआत की। कुछ ही महीनों में इन युवाओं की मेहनत और लगन रंग लायी और सैकड़ों पौधे रोपे गए। साथ ही इनके जूनुन को देखकर जांजगीर के अनेक युवा ‘जज्बा फाउंडेषन’ से जुड़ गए। इस तरह पौधरोपण का यह कारवां बढ़ता गया।
आज स्थिति यह है कि 20 से 25 युवाओं ने मिलकर नगर की कई जगहों में हरियाली ले आई है। खास बात यह है कि युवाओं द्वारा रोपे गए अधिकांष पौध आज भी जीवित हैं और हरियाली बिखर रहे हैं। युवाओं द्वारा पौधरोपण के साथ उसके संरक्षण पर विषेष ध्यान दिया जाता है। पर्यावरण को बचाने का सपना पाले इन युवाओं की फौज में अब शहर के दूसरे लोगों ने भी सहभागिता निभानी शुरू कर दी है, जिनमें डॉक्टर, व्यवसायी से लेकर कई नौकरीपेषा और जनप्रतिनिधि शामिल हैं।
‘जज्बा फाउंडेषन’ के संस्थापक सदस्य नवनीत राठौर कहते हैं कि पौधरोपण कर पर्यावरण को बचाने की प्रेरणा उन्हें अपने पूर्वजों से मिली है। वे कहते हैं कि जहां भी खाली स्थान मिलता है, वहां पौधरोपण करने का प्रयास किया जाता है और पौधों के संरक्षण के लिए हर स्तर पर प्रयास किया जाता है। वे बताते हैं कि पौधरोपण करने के लिए जज्बा फाउंडेषन के सदस्य खुद की कमाई का 5 से 10 फीसदी हिस्सा खर्च करते हैं और पर्यावरण को बचाने में योगदान देते हैं। इसी का परिणाम है कि बीते 3 बरसों में अब तक 3 हजार से अधिक पौधों का अलग-अलग जगहों पर रोपण किया जा चुका है।
जज्बा फांडेषन के एक और संस्थापक सदस्य नरेष पैगवार कहते हैं कि पौधरोपण एक पुनीत कार्य है। शहर में लगातार पेड़ों की कटाई हो रही थी। इसी के तहत हमारी सोच बनी की कि पर्यावरण की दिषा में पौधरोपण कर समाज के लिए कार्य किया जाए।
जज्बा फाउंडेषन के एक अन्य सदस्य राहुल अग्रवाल कहते हैं कि पर्यावरण बिगड़ रहा है और भागमभाग के समय में पौधरोपण करने कोई ध्यान नहीं देता। इसीलिए जज्बा फाउंडेषन ने पर्यावरण को बचाने के लिए पौधरोपण करने मन बनाया। वे चाहते हैं कि और भी लोग पौधरोपण के इस महाभियान से जुड़े, आने वाले दिनों में आसपास के क्षेत्रों में भी पौधरोपण किया जाएगा।
जज्बा फाउंडेषन के युवाओं ने पौधरोपण के प्रचार-प्रसार के लिए एक वेबसाइट भी बनाई है। साथ ही फेसबुक पर भी लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास, निरंतर जारी है। निष्चित ही जज्बा फांडेषन के युवाओं के ‘जज्बा’ एक मिसाल बन गया है और इसी का परिणाम है कि शहर विकास के लिए पेड़ों की कटाई के बाद भी हरियाली नजर आ रही है।

...ये भी निभाते हैं भूमिका
‘जज्बा फाउंडेषन’ के युवाओं के सकारात्मक सोच को देखते हुए शहर के अनेक युवाओं का संपर्क हुआ है। संस्थापक सदस्यों के अलावा पर्यावरण को बचाने किए जा रहे पौधरोपण में अब जज्बा फाउंडेषन में अमन अग्रवाल, मनमोहन अग्रवाल, आलोक अग्रवाल, सुषील अग्रवाल, जिला अस्पताल के एमडी डॉ. अनिल जगत, डेंटिस्ट डॉ. सौरभ शर्मा एवं सनत राठौर भी अहम भूमिका निभाते हैं। इनके अलावा अन्य सदस्य भी हैं, जो पर्यावरण संरक्षण करने किए प्रयास में महती भूमिका निभाते आ रहे हैं।

इन इलाकों में पौधरोपण
वैसे तो शहर में जहां भी खाली जगह मिलती है, वहां इन युवाओं द्वारा पौधरोपण का प्रयास किया जाता है। बीते इन 3 बरसों में अकलतरा रोड के डिवाइडर, जिला अस्पताल, हसदेव क्लब तुलसी भवन, नैला के मुक्तिधाम में पौधरोपण किया गया है। सदस्यों का कहना है कि आने वाले दिनों में जो भी उद्यान बेजार हो गए हैं, वहां हरियाली लाने पौधरोपण किया जाएगा। इस दिषा में सदस्यों द्वारा निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण
पर्यावरण दिवस 5 जून को कचहरी चौक के पास अंबेडकर उद्यान में नपा अध्यक्ष रमेष पैगवार और उपाध्यक्ष नीता चुन्नू थवाईत के नेतृत्व में ‘जज्बा फाउंडेषन’ के सदस्यों ने पौधरोपण किया। इस उद्यान में अंबेडकर की प्रतिमा लगी है, लेकिन साफ-सफाई का अभाव था। इसी को ध्यान में रखकर पौधरोपण किया गया, ताकि अंबेडकर उद्यान में हरियाली बनी रहे और लोगों वहां तक पहुंचे।

युवाओं ने रोपे ये पौधे...
युवाओं द्वारा हरश्रृंगार, पुरनजीवा, प्राइड ऑफ इंडिया, करंज, झारूल, गुलमोहर, हाउडी क्लाउडी, स्वर्णचंपा, मधुकामिनी, कचनार, अमलताष, बरगद, पीपल समेत अन्य पौधे रोपे गए हैं। पौधरोपण की सबसे बेहतर स्थिति नैला के मुक्तिधाम में देखी जा सकती है।

मषरूम ने तोड़ा ‘गरीबी’ से नाता

युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ी समस्या बन गया है, लेकिन जिन युवाओं में जज्बा है और सीखने की ललक है, उनकी राह आसान होते देर नहीं लगती। मषरूम से रोजगार मिलने के कारण गरीबी से युवाओं का नाता भी टूटा है। ऐसी मिसाल कायम किया है, जांजगीर-चांपा जिले के लक्ष्मीनारायण मन्नेवार और दीनदयाल यादव ने। दरअसल, मषरूम इनके आय का मुख्य जरिया बन गया है, जिससे इनकी गरीबी परिस्थिति में भी बदलाव आने लगा है।
ये हैं, चांपा इलाके के बालपुर गांव के लक्ष्मीनारायण मन्नेवार। इन्होंने शारीरिक विकलांगता को मात देते हुए मषरूम उत्पादन में अपनी अलग ही पहचान बनाई है और हर साल हजारों रूपये मषरूम उत्पादन करके आय अर्जित कर रहे हैं। ऐसे ही बहेराडीह गांव के दीनदयाल यादव ने भी मषरूम को अपनी आय का प्रमुख जरिया बना रखा है। कम खर्च में आय का बड़ा साधन साबित हो रहा है, मषरूम उत्पादन। साथ ही मेहनत भी कम है, एक बार स्पॉन लगाने का काम हुआ, उसके बाद पानी से हल्की-हल्की सिंचाई ही करनी पड़ती है।
साल में कुछ महीनों को छोड़ दें तो मषरूम का उत्पादन काफी अधिक होता है और मषरूम में पोषक तत्वों होने के कारण इसके खरीददारों की कमी भी नहीं रहती। बषर्ते, मषरूम उत्पादकों को बिक्री के लिए गांव से शहर की ओर रूख करना पड़ता है। देखा जाए तो संसाधन के लिहाज से कम खर्च में मषरूम उत्पादन में हजारों रूपये की आमदनी होती है। यही वजह है कि प्रषिक्षण के माध्यम से और भी युवा, मषरूम उत्पादन से धीरे-धीरे जुड़ रहे हैं। मषरूम तैयार करने वाले कृष्णकुमार और दीनदयाल, जिले के अनेक जगहों में जाकर प्रषिक्षण दे चुके हैं। जिससे लोगों को रूझान इस नगदी खेती को बढ़ता ही जा रहा है।
इतना जरूर है कि मषरूम की खेती करने वाले लक्ष्मीनारायण मन्नेवार को प्रचार-प्रसार की कमी खलती है, लेकिन मषरूम का जितना उत्पादन वे कर रहे हैं, उसकी बिक्री नजदीक के शहरों में होने से उनमें संतोष भी नजर आता है। दूसरी मषरूम का रोजगार और अधिक नहीं बढ़ने का उन्हें अफसोस भी है।
मषरूम की खेती करने वाले किसान दीनदयाल यादव को बस, एक ही कमी खलती है और वह है, मषरूम बनाने वाले ‘स्पॉन’ ( मषरूम बीज ) की। मषरूम के लिए स्पॉन, किसानों को रायपुर या बिलासपुर से लाना पड़ता है, जिसके चलते मषरूम उत्पादन और अधिक नहीं हो पा रहा है। इसके कारण खर्च में भी कुछ वृद्धि हो जाती है। वे कहते हैं कि मषरूम के व्यवसाय को बेहतर तरीके से करने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र और चांपा की एक संस्था द्वारा ‘स्पॉन’ बनाने की दिषा में कार्य करने मदद करने का भरोसा दिलाया है।
दूसरी ओर कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों के अपने दावे हैं। उनकी मानें तो मषरूम उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्र में बुलाकर और किसानों के गांवों में जाकर प्रषिक्षण दिया जाता है। साथ ही स्पॉन ( मषरूम बीज ) बनाने के लिए लैब में जानकारी दी जाती है।
मषरूम उत्पाद कर रहे किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर ही आय का बड़ा जरिया हासिल किया है, लेकिन स्पॉन की व्यवस्था, जिले में नहीं होने से मषरूम व्यवसाय थम सा गया है। ऐसे में प्रषासन को चाहिए कि किसानों को प्रोत्साहित करे, ताकि जिले के और भी किसान और युवा, मषरूम से रोजगार पाकर उन्नत और खुषहाल बन सके।

Sunday, February 2, 2014

जांजगीर-नैला के ‘दधिचि’ सूरजमल जैन

समाजसेवी स्व. श्री सूरजमल जैन जी
जांजगीर-नैला ( छत्तीसगढ़ ) के जैन परिवार ने देहदान का जो मिसाल पेश की है, वह समाज के हर वर्ग के लिए अनुकरणीय है। 93 साल की उम्र में समाजसेवी सूरजमल जैन का देहांत हुआ तो उनके पार्थिव देह को मेडिकल कॉलेज बिलासपुर को सौंप दिया गया। इस तरह उन्होंने पुरातन ‘दधिचि’ परंपरा को पुरर्जीवित किया है। उनके देह ‘दान’ की तारीफ करते हुए लोगों ने समाजसेवी सूरजमल जैन को जांजगीर-नैला के ‘दधिचि’ की संज्ञा दी है।
खास बात यह है कि सूरजमल जैन के देहांत के बाद, उनसे प्रेरणा लेकर उनके बेटे महेन्द्र जैन व बहु शोभा जैन ने भी अपना देहदान किया है। इस पुण्य कार्य से न केवल उनका परिवार गौरव महसूस कर रहा है, बल्कि समाज के लोग भी इस सद्कार्य से अभिभूत हैं।
देहदान का संकल्प लेने वाले महेन्द्र जैन और श्रीमती शोभा जैन और साथ में परिजन सुषील जैन ( पीछे )
30 जनवरी यानी राष्ट्रपिता की पुण्यतिथि के दिन समाजसेवी सूरजमल जैन ने भी देह त्यागा। इसके बाद उनकी इच्छा के अनुरूप परिवार के लोगों ने मेडिकल कॉलेज बिलासपुर प्रबंधन को जानकारी दी। दरअसल, 3 साल पहले समाजसेवी सूरजमल जैन ने देहदान करने की मंषा परिवार वालों के समक्ष जाहिर की थी। इस पर सभी ने खुषी जाहिर करते हुए उनके इस पुनित कार्य की प्रषंसा की थी। इसके बाद देहदान करने का आवेदन दिया गया था। जिसके तहत देहावसान के बाद मेडिकल कॉलेज को उनका शरीर सौंप दिया गया।
इधर नैला में उनके निवास पर समाजसेवी सूरजमल जैन को श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। न केवल सूरजमल जैन का परिवार, बल्कि जैन समाज के लोग गदगद हैं कि उनके समाज के किसी व्यक्ति ने ऐसा सद्कार्य किया है, जिससे दूसरे लोग भी प्रेरणा लेंगे। उनकी मानें तो छग ही नहीं, बल्कि देष में जैन समाज का यह पहला ऐसा अवसर होगा, जब समाज के किसी व्यक्ति ने अपने शरीर दान किया हो। फिलहाल, सूरजमल जैन के देहदान की सोच को महापुरूष ‘दधिचि’ से जोड़ा जा रहा है और उन्हें, जांजगीर-नैला के ‘दधिचि’ भी कहा जा रहा है।
गौरतलब है कि मेडिकल कालेज बिलासपुर में छात्रों को पढ़ने के लिए ‘डमी’ शरीर दिया जाता है, जिससे उनकी पढ़ाई ठोस तरीके से नहीं हो पाती। मेडिकल छात्रों की पढ़ाई अगर सही न हुई तो डॉक्टर, कैसे लोगों का सही इलाज कर पाएंगे। इसी तकलीफ को ध्यान में रखकर जांजगीर-नैला के एक ही परिवार के तीन लोगों ने देहदान का संकल्प लिया है। निष्चित ही यह निर्णय सभी समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणादायी कदम है।
सूरजमल के सद्कार्य से सभी लोग अभिभूत हैं और वे उनके कार्य की तारीफ करते हुए समाज के हर वर्ग के लोगों को पुरानी रूढ़िवादिता को तोड़कर शरीर दान करने आगे आएं, ताकि मेडिकल छात्रों को पढ़ाई और शोध में हर तरह से सहयोग मिले। इस एक पहल से आने वाले दिनों में एक सकारात्मक परिणाम आने के आसार भी जाग्रत हो गए हैं।
हमारे समाज में ‘देहदान’ की पुरानी परम्परा है। ऋषि ‘दधिचि’ ने अपना देह देकर देवताओं को उपकृत किया था, लेकिन आज के समय में साइंस के लिए जो कार्य जैन परिवार ने किया है, उसे हर किसी के द्वारा सराहा जा रहा है। इस मिसाल के बाद, आधुनिक समाज को इस त्याग से निष्चित ही नई प्रेरणा मिलेगी।
...अंत में ऐसे ‘व्यक्तित्व’ को सादर प्रणाम...

Wednesday, January 1, 2014

‘तनख्वाह प्लस नहीं, चैलेंजिंग हो जॉब’

अभिजीत षर्मा
जीवन के किसी भी पड़ाव में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए, क्योंकि असफलताओं के पीछे ही सफलता छिपी रहती है, बस उसके भीतर झांककर सफलता की उस परछाई को पहचाने की जरूरत रहती है। वैसे भी कड़ी मेहनत की कोई सानी नहीं रहती और मेहनत करने वालों को कभी भी निराषा नहीं होती। मेहनत, न खुलने वाले ताले की ऐसी चाबी है, जिसकी बदौलत असफलता के हर अंधकार को दूर किया जा सकता है। समाज के उत्थान की दिषा में सेवा करने के लिए, ‘तनख्वाह प्लस जॉब’ की कोई अहमियत नहीं होती। जॉब ऐसा हो, जो ‘चैलेंजिंग’ हो और जिसके माध्यम से लोगों के हित में कार्य किया जा सके।
यह बातें सिविल सेवा परीक्षा यानी पीएससी में ‘अधीनस्थ लेखा सेवा अधिकारी’ के तौर पर चयनित अभिजीत षर्मा ने खास बातचीत में कही। अभिजीत को पीएससी की परीक्षा में 106 रैंक मिला है और यह उनका दूसरा प्रयास था। इस उपलब्धि से खुद अभिजीत एवं उनके परिवार तथा मित्रगण काफी उत्साहित हैं, क्योंकि उन्होंने पीएससी जैसी अहम परीक्षा के लिए भी कहीं से भी कोचिंग नहीं ली। उनकी मानें तो पीएससी परीक्षा की तैयारी में उन्हें सबसे अधिक मां श्रीमती पुष्पा षर्मा का सहयोग मिला। साथ ही छोटे भाई समेत परिवार के अन्य लोगों व मित्रगण ने भी उनका बढ़-बढ़कर उत्साहवर्धन किया, जिसके परिणाम स्वरूप आज पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने का सपना साकार हो सका है।
बातचीत में अभिजीत ने बताया कि उनकी प्रारंभिक षिक्षा खरौद में मामा सुबोध षुक्ला ( अध्यक्ष, पानी पंचायत ) के घर रहकर, षिवरीनारायण के सरस्वती षिषु मंदिर में हुई। इसके बाद उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस तरह बिलासपुर के चौकसे इंजीनियरिंग कॉलेज में 2006 में दो साल यानी 2008 तक लेक्चररषिप की और वहां अध्यापन के अनुभव के बाद उन्होंने बिलासपुर में ही दो साल बीएसएनएल में सेवाएं दीं। इस दौरान वे लगातार अपने आयाम को पाने के लिए कोषिष में लगे रहे और 2010 में एयरपोर्ट ऑथरिटी ऑफ इंडिया की विषेष परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए एयरपोर्ट टैªफिक कंट्रोलर ( एटीसी ) के पद पर चयन हुए। फिलहाल, वे इसी पद पर वर्तमान में कार्यरत हैं और प्रथम नियुक्ति मुंबई में हुई। इसके चंद महीनों बाद से वे अब महाराष्ट्र के गोंदिया में एटीसी के पद पर सेवाएं देते आ रहे हैं।
अभिजीत ने अपनी पढ़ाई के बारे में बताया कि एटीसी के पद पर पदस्थ होने की वजह से समय कम मिलता था। साथ ही एटीसी का कार्य काफी जिम्मेदारी भरा है। साथ ही तनाव भी रहता है कि किसी तरह की चूक न हो जाए, इसके लिए सावधानी बरतने के लिए हमेषा सतर्क रहना पड़ता। बावजूद, वे हर दिन पीएससी की तैयारी में लगे रहते। वे बतातें हैं कि पीएससी की परीक्षा उन्होंने पहली बार 2008 में दी थी, इस दौरान वे मेंस की परीक्षा में पीछे हो गए। हालांकि, उन्होंने असफलता से हिम्मत नहीं हारी और उससे सबक लेते हुए एक बार फिर तैयारी षुरू की और नतीजा, उनके सपनों के लिहाज से रहा।
अभिजीत बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग करने के बाद वे कई और जॉब के लिए तैयारी कर रहे थे और इस दौरान उनकी नियुक्ति छग राज्य विद्युत मंडल में जेई तथा इंडियन टेलीकॉम और रिलायंस कंपनी में भी उंचे पद पर हुआ था, लेकिन मन ने तो कुछ और ठान रखा था। लिहाजा, वे इन नौकरियों को ज्वाइन नहीं किया और पीएससी परीक्षा की तैयारी में लग गए। इस दौरान एटीसी के तौर पर नियुक्ति हुई।
वे मानते हैं कि किसी भी जॉब को केवल तनख्वाह बेस पर नहीं करना चाहिए, उसके माध्यम से सामाजिक हित तथा समाज में जनचेतना लाने के दृष्टिकोण से क्या किया जा सकता है, ऐसी आषाभरी सोच होनी चाहिए। उनकी सोच ऐसी है, इसलिए वे सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से समाज के तबके लिए सेवा देना चाहते थे, जो एक तरह से पूरी हुई है, किन्तु उनकी नई उंचाईयों को छूने की आकांक्षाएं अभी पूरी नहीं हुई है। वे कहते हैं कि एयरपोर्ट ट्रैफिक कंट्रोलर के जिस पद पर वे कार्य कर रहे है, उसके लिहाज से ‘अधीनस्थ लेखा सेवा अधिकारी’ की तनख्वाह में काफी अंतर है, लेकिन उन्हें तनख्वाह के बजाय, जॉब में चैलंेज नजर आता है, उससे वे आकर्षित हुए हैं।
अंत में उन्होंने अपने संदेष में यही कहा कि हर व्यक्ति में कोई न कोई, गुण छिपा रहता है, बस उसे पहचानने की जरूरत रहती। किसी भी व्यक्ति को अपने गुणों को निखारने के लिए सतत प्रयत्नषील रहना चाहिए, इसके बाद सफलता निष्चित ही कदम चूमती है। असफलता की परछाई भी किनारे नहीं आती। यह भी सही है कि असफलता से कभी निराष होकर नहीं बैठना चाहिए, बल्कि असफलता के सहारे से सफलता को साधने की भरसक कोषिष करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सभी को समान अवसर मिलता है, किन्तु सफलता उसे ही मिलती है, जो अपनी योग्यता से उसकी पहचान कर लेता है।


प्रषासनिक क्षेत्र में सेवा देने की है रूचि
अभिजीत अपनी सफलता से गदगद तो हैं, किन्तु उनकी मानें तो उनका लक्ष्य, प्रषासनिक क्षेत्र में सेवा देने की है, इसलिए वे आने वाले दिनों में अपनी कोषिषों को जारी रखेंगे और एक दिन प्रषासनिक क्षेत्र की सेवाओं में चयनित होकर ही रहेंगे। वे कहते हैं कि पीएससी में 106 रैंक के लिहाज से उनका चयन डीएसपी के पद पर हो जाता, लेकिन वे पुलिस विभाग में नही जाना चाहते। प्रषासन में कार्य करने की रूचि है, किन्तु इसके लिए उन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा। खैर, वे उंचाईयों को प्राप्त करने के लिए कमर कस चुके हैं और निष्चित ही उनके मन की आषाएं जरूर पूरी होंगी, क्यांेंकि कहा भी जाता है कि ‘कोषिष करने वालांे की कभी हार नहीं होती’।

समाज षास्त्र से लहराया परचम
इलेक्ट्रॉनिक्स से इंजीनियरिग और स्कूल में विज्ञान की पढ़ाई के बाद पीएससी में समाज षास्त्र लेकर सफलता अर्जित करना किसी चुनौती से कम नहीं थी। इस चुनौती को अभिजीत ने स्वीकार किया और निरंतर अध्ययन करते परीक्षा उत्तीर्ण किया तथा उस मिथक को भी तोड़ दिया, जिसमें कहा जाता है कि किसी प्रतियोगी परीक्षा को, बिना कोचिंग के उत्तीर्ण नहीं किया जा सकता। अभिजीत कहते हैं कि एटीसी की नौकरी करते पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता है, उसी समय का सदुपयोग कर महती परीक्षा में उत्तीर्ण होकर खुद को साबित किया और सभी के सहयोग से मिले अवसर को भुनाने में भी कामयाब रहा।

Thursday, December 20, 2012

दूधमुंहे बच्चों की अनोखी ‘पाठशाला’

 कार्यस्थल पर बच्चों को पढ़ाती निरक्षर ‘सरजूबाई’
बच्चों को शिक्षा देने के लिए देश भर में लाखों पाठशाला संचालित कराई जा रही हैं, लेकिन दूधमुंहे बच्चों की एक अनोखी ‘पाठशाला’ भी चल रही है, जहां बच्चों को संस्कारित शिक्षा देने के साथ ही, देशभक्ति गीतों से भी रूबरू कराया जाता है। जी हां, जिले के नवागढ़ इलाके के गोधना गांव में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत कार्य के दौरान, ऐसा ही नजारा हर दिन देखने को मिलता है, जब दूधमुंहे बच्चों की ‘पाठशाला’ लगती है और उन्हें पढ़ाने पहुंचती हैं, अनपढ़ ‘सरजू बाई’। 60 साल की सरजू बाई, भले ही अशिक्षित हांे, लेकिन खुद के प्रयास से उन्होंने जो तामिल हासिल की है, उससे बच्चों का भविष्य जरूर निखर रहा है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा के तहत होने वाले कार्य के दौरान, मजदूरों के 5 से अधिक बच्चों के लालन-पालन के लिए एक महिला को काम पर रखने का प्रावधान है। इसी के तहत पिछले पांच साल से ग्राम पंचायत गोधना में 60 साल की ‘सरजू बाई’ काम कर रही है। वैसे तो उनकी जिम्मेदारी कार्य के समय बच्चों की देखभाल की है, लेकिन वह अपने ज्ञान का प्रसार करने की चाहत रखते हुए बच्चों की पढ़ाई भी कराती है, जिस पर मजदूर भी गदगद नजर आते हैं। एक तो बच्चों की पढ़ाई हो जाती है, वहीं उनका मनोरंजन भी हो जाता है। लिहाजा, मजदूरों को काम के दौरान कोई समस्या नहीं आती।
सरजू बाई कहती हैं कि वह छह महीने ही स्कूल गई थी, परंतु बाद में किसी कारणवश पढ़ाई छोड़नी पड़ी। जिसका उन्हें मलाल है। पढ़ाई की इच्छा शुरू से रही है, जिसके कारण वह गिनती, पहाड़ा तथा देशभक्ति गीतों को पढ़ती रहती थी। दिलचस्प बात यह है कि वह एक कक्षा भी नहीं पढ़ी है, लेकिन उन्हें ‘अक्षर’ के साथ ‘अंकों’ की भी पहचान है, जिसके बाद वह आगे बढ़ती गईं और आज वह ढलती उम्र में, कहीं न कहीं शिक्षा की अलख जगाने वाली ‘खान’ बन गई हैं। वह कहती हैं, जब भी मन करता है, ‘देशभक्ति गीत’ गुनगुनाती रहती हैं। इस तरह एक के बाद एक, सब याद हो गए। निश्चित ही, सरजू बाई ने एक मिसाल कायम की है, क्योंकि अच्छी शिक्षा के बाद भी कई लोगों की पढ़ाई से मोह भंग हो जाता है, वहीं अनपढ़ होने के बाद भी पढ़ाई के प्रति अपनी जिज्ञासा बनाई हुई है, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाए, कम ही नजर आती है। वह यह भी कहती है, दूधमुंहे बच्चों की देखरेख के साथ, स्कूल जाने से पहले कुछ पढ़ाई हो जाए तो, इसके बाद बच्चों को ही भविष्य में लाभ होगा।
वह राष्ट्रगान गाती हैं और बच्चे उसे दोहराते हैं। यही हाल, गिनती व पहाड़ा का भी है। कई घंटों तक चलने वाले कार्य के दौरान यही सिलसिला चलता रहता है। ‘झण्डा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ गाती हैं तो बच्चे भी पूरे उत्साह से गाते नजर आते हैं। ‘सरजू बाई’ अनेक गाना गाकर भी सुनाती हैं, जिससे हर कोई भाव-विभोर हुए बिना नहीं रहता।
इतना ही नहीं, बच्चों का कई मनमोहक गीतों से मनोरंजन कराती हैं। ‘हाथी देखो बड़ा जानवर, लंबी सूंड हिलाती है’, ‘हरे रंग का है यह तोता’, ‘रेल चली रे रेल, बड़े मजे का खेल’ जैसे गीतों को गाती हैं और फिर बच्चे भी मग्न नजर आते हैं। मजदरू मां-बाप की भी उन्हें इस दौरान याद नहीं रहती है। बस, सरजू बाई की पढ़ाई व सीख की बातों में ही खोए हुए नजर आते हैं।
सरजू बाई, रानी लक्ष्मी बाई द्वारा फिरंगियों के खिलाफ की गई लड़ाई को भी गीतों के माध्यम से बखान करती हैं और कहती हैं, ‘दूर हटो फिरंगियों, आती है झांसी की रानी’।
मनरेगा के कार्य स्थल पर दूधमुंहे बच्चों को संभालने के साथ उनकी पढ़ाई कराने की बात से, मजदूर भी खुश नजर आते हैं और उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह पाते। मजदूर जोहन कश्यप कहता है कि बच्चों को कोई परेशानी नहीं होती, उनका भी काम अच्छे से होता है।
ऐसा ही कुछ कहना है कि गोधना के रोजगार सहायक सुरेश कुर्रें का भी। छोटे-छोटे बच्चों को अच्छे से संभालती है। बढ़िया काम करती है, बच्चों को सीखाती-पढ़ाती है।
मनरेगा योजना के तहत जो व्यवस्था मजदूरों के बच्चों की देखभाल के लिए की गई है, इसे लेकर मनरेगा के जिला कार्यक्रम अधिकारी योगेश्वर दीवान का कहना है कि कम पढ़े-लिखे होने के बाद भी सरजू बाई का प्रयास, निःसंदेह सराहनीय है। कार्य स्थल पर बच्चों को अच्छी शिक्षा देती है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम ही होगी।
मजदरू परिवार के दूधमुंहे बच्चों को निश्चित ही ऐसी तालिम कम जगह ही मिलती होंगी। ऐसे में ‘सरजू बाई’ द्वारा जिस तरह बच्चों को शिक्षा दान दिया जा रहा है, वह अनोखी मिसाल ही साबित हो रही है, क्योंकि दूधमुंहे बच्चों की ऐसी अनोखी ‘पाठशाला’, शायद ही किसी ने देखी होगी और न सुनी होगी। इस तरह शिक्षा की नींव को मजबूत करने वाली अनपढ़ ‘सरजू बाई’ के योगदान को, भुलाया नहीं जा सकता।

Thursday, May 10, 2012

देश के लिए ‘कर्ज’ चुकाने का शुरूर !

विकास मिश्रा
रिजर्व बैंक के आर्थिक आय-व्यय के सर्वे में खुलासा हुआ है कि भारत के हर नागरिक पर 30 हजार का कर्ज है और जन्म लेते ही हर व्यक्ति 30 हजार रूपये के कर्ज तले दबा रहता है। इतना जरूर है कि कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष तौर पर कर्ज नहीं लिया रहता, मगर देश के नागरिक होने के कारण हर व्यक्ति पर ‘कर्ज’ स्वाभाविक तौर पर बताया जाता है।
ऐसे ही पिछले दिनों रिजर्व बैंक ने एक रिपोर्ट जारी की गई, जिसके बाद जांजगीर इलाके के सिवनी गांव निवासी विकास मिश्रा ने तय किया कि देश हित में 30 हजार का जो कर्ज बताया जा रहा है, उसे वह अपने कंधे से उतारेगा।
श्री मिश्रा ने साल भर पहले भारतीय स्टेट बैंक जांजगीर शाखा से 30 हजार रूपये का चेक भारत सरकार ( गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ) के नाम जारी किया और उसे कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी को भेज दिया। इस अलावा विकास, अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहा है कि वह उस ऋण से उऋण होना चाहता है, जिसे उसने खुद उधार नहीं लिया है। देश का एक जिम्मेदार बासिंदा होने के कारण उन्होंने तय किया कि वह हर हाल में अपना फर्ज निभाएगा और देश के ‘कर्ज’ को खत्म करने बीड़ा उठाया। इस तरह वह साल भर से हर कहीं चक्कर पर चक्कर काट रहा है, किन्तु उसका 30 हजार का चेक लेने कोई तैयार नहीं है। दूसरी ओर कई ऐसे हैं, जो उनकी मंशा को नहीं समझ रहा है। विकास मिश्रा के इस तरह के नायाब प्रयास की प्रशंसा ही की जा सकती है, क्योंकि इस तरह की कोशिश देश भर में हो और हर नागरिक इसी मंशा से काम करे तो देश, कर्ज से मुक्त हो जाएगा।
देश का कर्ज उतारने का शुरूर लिए विकास मिश्रा भटक रहे हैं, उन्हेें समझ भी नहीं आ रहा है, वे क्या करें, बस वे खुद को कर्ज से मुक्त करना चाहते हैं। विकास मिश्रा कहते भी हैं कि इस तरह के प्रयास वे कर रहे हैं, इसके बाद उन्हें आशा है कि और भी लोग आगे आएंगे। इसके बाद देश को निश्चित ही लाभ होगा।
विकास मिश्रा की मानें तो वे साल भर पहले से लगातार कोशिश कर रहे हैं कि उनके सिर से कर्ज का बोझ उतर जाए और वह 30 हजार का चेक लेकर भटक रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले साल उन्हें रिजर्व बैंक के आय-व्यय संबंधी की रिपोर्ट से पता चला कि देश के हर व्यक्ति पर जन्म लेते हुए 30 हजार का कर्ज होता है। इसके बाद वह चेक लेकर यहां-वहां भटकने लगे। भारत सरकार के नाम 3 चेक भेज चुके हैं, किन्तु किसी तरह कहीं से पहल नहीं हो रही है।
विकास मिश्रा यह भी कहते हैं कि पहला चेक उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भेजा, क्योंकि केन्द्र में कांग्रेस नीत सरकार है। चेक मिलने संबंधी वहां से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद इस साल अजीत जोगी और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार पटेल को चेक भेजे गए, वहां से भी विकास मिश्रा को कोई जवाब नहीं मिला। हालांकि विकास मिश्रा, निराश नहीं है, उनका कहना है कि वह हर हाल में एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाएगा और खुद पर से 30 हजार का कर्ज उतारने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।
बहरहाल विकास मिश्रा पूरे दमखम के साथ देश के नाम खुद के कर्ज को उतारने में हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। इतना जरूर है कि उन्हें किसी प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि का सहयोग नहीं मिल रहा है। विकास मिश्रा ने एक बेहतर प्रयास तो किया है, अब देखने वाली बात होगी कि देश के नाम ‘कर्ज’ को उतारने के लिए यह कारवां, कितना आगे बढता है। इतना जरूर है कि विकास मिश्रा ने अपने दायित्व का परिचय तो दे दिया है, अब बारी हम सब की है।


अनूठे प्रयास की तारीफ
ये अलग बात है कि अफसर, विकास मिश्रा के सहयोग करने आगे नहीं आ रहे हैं, मगर देश के प्रति उनके समर्पण की तारीफ किए बगैर नहीं पा रहे हैं। आम लोग भी उनकी कोशिश की सराहना कर रहे हैं और इस तरह की मिसाल, देश के हर नागरिक को पेश करने की बात भी उठने लगी है। छोटे से गांव सिवनी से शुरू हुआ यह प्रयास, दिल्ली के गलियारों तक पहुंचेगा और देश के कोने-कोने से इस तरह के प्रयास होंगे, ऐसी आशा के साथ विकास मिश्रा, देश हित में ‘कर्ज’ से मुक्ति पाने में लगे हैं।


टैक्स की चोरी करने वालों पर तमाचा
विकास मिश्रा ने जिस तरह से अनूठा प्रयास किया है और इससे करोड़ों भारतीयों को जोड़ने की कोशिश हुई है, वहीं देश के ‘कर्ज’ को चुकाने की सोच ने टैक्स चोरी करने वाले उन लोगों को तमाचा जड़ा है, जो देश हित को दरकिनार कर विकास कार्य को अवरोध करने के लिए टैक्स चोरी करते हैं। निश्चित ही इस पहल के बाद लोगों में जागरूकता आएगी और देश के प्रति सेवा भावना भी जागृत होगी।

Saturday, September 3, 2011

चौथी पीढ़ी जगा रही शिक्षा की अलख

लक्ष्मणेष्वर मंदिर
पत्थरों की खदान के नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद, शिक्षकों की भी खान है। छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात खरौद, जांजगीर-जिले के पामगढ़ क्षेत्र में स्थित है, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षक बनने की परिपाटी चली आ रही है। यहां तीन परिवार तो ऐसे हैं, जिनकी दो-दो पीढ़ियों ने दशकों तक ज्ञान की रोशनी बांटी और अब, आगे की दो पीढ़ी अपने पूर्वजों के नक्शे कदम पर चलकर शिक्षा की अलख जगा रही हैं। कहने का मतलब, चौथी पीढ़ी शिक्षा दान के महायज्ञ में लगी हुई हैं। खरौद में एक परिवार ऐसा है, जिनकी तीन पीढ़ियां शिक्षा को समर्पित रहीं हैं और वर्तमान में पिता व दो पुत्र, विद्यार्थियों को जीवन की ककहरा सिखा रहे हैं। यहां अब तक कुल शिक्षकों की संख्या डेढ़ हजार को पार गई है। ऐतिहासिक नगरी खरौद के अधिकांश परिवारों में कोई न कोई शिक्षक हैं या रहे हैं। ऐसे में यहां की भूमि को सरस्वती पुत्रों की जन्मस्थली कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जिले के पामगढ़ विकासखंड अंतर्गत नगर पंचायत खरौद की आबादी 25 हजार से अधिक है। यह नगरी प्राचीन समय से शिक्षा का केन्द्र रही है। वैसे तो यहां लोगों ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर हर क्षेत्र में मुकाम हासिल किया है और वे बड़े-बड़े ओहदों मे ंपदस्थ हुए हैं, किन्तु नगर में शिक्षकीय पेशा का एक अलग ही स्थान है। खरौद के डेढ़ हजार से अधिक लोग अब तक शिक्षक बन गए हैं। इनमें से लगभग लगभग सात सौ शिक्षकों का सेवा कार्य पूर्ण हो चुका है तथा कुछ शिक्षक इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं।
षिक्षा की अलख जगाता यादव परिवार
खरौद के शुकुलपारा निवासी स्व. झुमुकलाल यादव, स्व. बलदाउ यादव एवं तिवारी पारा निवासी स्व. रामचरण आदित्य के परिवार की चौथी पीढ़ी शिक्षकीय कार्य का निर्वहन कर रही हैं, वहीं तिवारी पारा के ही स्व. तांतीराम साहू के परिवार की तीसरी पीढ़ी शिक्षकीय पेशे से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा यहां 50 से अधिक परिवार के सदस्य, दो पीढ़ी तक शिक्षक के रूप में सेवा प्रदान कर रहे हैं। स्व. झुमुकलाल यादव एवं उनके पिता स्व. बृजलाल यादव, शिक्षक थे और उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर, झुमुकलाल यादव के दो पुत्र बद्रीप्रसाद यादव और द्वारिका यादव भी शिक्षा के प्रति समर्पित हैं तथा बद्रीप्रसाद का पुत्र चितरंजन यादव भी शिक्षक हैं, वहीं स्व. बलदाउ यादव तथा उनके पिता स्व. हरलाल यादव शिक्षक थे और अब उनके पुत्र सुरेन्द्र यादव सहित पौत्र संजय यादव शिक्षकीय पेशे से जुड़े हुए हैं।
षिक्षा की अलख जगाता आदित्य परिवार
इसी तरह स्व. रामचरण आदित्य शिक्षक थे और उनके छह में से चार पुत्र रामबगश आदित्य, रामधन आदित्य, रामरतन आदित्य एवं रामप्रताप आदित्य ने शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। रामभरोस के दोनों पुत्र भरतलाल एवं स्व. नंदकिशोर, रामबगश के दो पुत्रों में एक निर्मल कुमार आदित्य, रामरतन की तीनों पुत्रियों स्व. मधु व स्व. आशा शिक्षक रहीं और सुश्री कल्याणी सेवानिवृत्त हुई हैं। रामप्रताप के दो पुत्र नरेन्द्र कुमार आदित्य एवं महेन्द्र आदित्य शिक्षक हैं। इसके अलावा भरतलाल के दो पुत्र प्रकाश नारायण आदित्य एवं प्रमोद कुमार आदित्य तथा स्व. नंदकिशोर आदित्य की दो पुत्रियां विद्यालता, विनयलता तथा एक पुत्र विनायक आदित्य शिक्षक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।
षिक्षा की अलख जगाता साहू परिवार
इसी तरह स्व. तांतीराम साहू के पुत्र विनोद कुमार साहू सहित पौत्र रामशरण साहू एवं पवन साहू, तीसरी पीढ़ी के रूप में सेवा दे रहे हैं। इस परिवार से बाद में जुड़ी, रामशरण की पत्नी भी शिक्षक हैं।
खरौद में शिक्षकों की संख्या व उनकी उपलब्धियों के बारे में क्षेत्र के सैकड़ों गांवों में चर्चा होती रहती है, क्योंकि प्राचीन समय से ही यह नगरी शिक्षा का केन्द्र रही है और शिक्षा के बेहतर माहौल के कारण यहां के अधिकांश परिवारों में कोई न कोई शिक्षक है। यहां दूर-दूर से लोग आकर पढ़ते थे औ यही कारण है कि वे आज भी विद्या अध्ययन की इस भूमि को प्रणाम किए बगैर नहीं रह पाते। नगर के बुजुर्ग शिक्षक बताते हैं कि खरौद के शुकुलपारा में सन् 1927 से प्राथमिक शाला संचालित है, वहीं मिडिल स्कूल 1935 में शुरू हुआ। इसके अलावा 1962 में हाईस्कूल खुला तथा नगर में ल़क्ष्मणेश्वर महाविद्यालय की स्थापना इसी सत्र में हुई। आसपास गांवों में दशकों में पहले शिक्षा के लिए एक भी विद्यालय नहीं होने से छात्र, यहां आकर अध्ययन करते थे, जो आज विभिन्न पदों पर पदस्थ हैं। दूसरी ओर खरौद के शिक्षक, आसपास क्षेत्र एवं दूसरे जिलों में भी पदस्थ है। अध्ययन-अध्यापन का माहौल तथा शिक्षकों का, समाज में सम्मानजनक स्थान को देखते हुए लोगों का रूझान भी शिक्षकीय पेशा की ओर ज्यादा है, इसमें आने पीढ़ी भी अपनी पूरी भूमिका निभा रही हैं, यह बात खरौद के लिए बड़ी उपलब्धि है।
इतना तो सभी जानते हैं कि शिक्षा के बिना, सशक्त समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। शिक्षा की नींव को मजबूत कर ही, हम अपनी भावी पीढ़ी को संस्कारित तथा उन्नति की शिखर पर देख सकते हैं। आज जो विकास हम देख रहे हैं, निश्चित ही वह शिक्षा के प्रसार का ही प्रतिफल है। शिक्षा के विकेन्द्रीकरण के कारण जहां हर वर्ग तक शिक्षा पहुंची है, वहीं इससे लोगों में जागरूकता भी है। शिक्षा, वैसे हर तरह से समाज को प्रभावित करती है और व्यक्ति के व्यक्तित्व को भी बदलने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि हमेशा, बेहतर शिक्षा हर जगह वकालत होती है। ऐसे में खरौद के शिक्षकों के योगदान एवं भावी पीढ़ी के इस परिपाटी में जुड़ने को, एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर माना जा सकता है। निश्चित ही, यह सरस्वती पुत्रों की भूमि धन्य है, जहां एक ऐसी परंपरा की होड़ है, जिससे समाज को एक नई दिशा मिलती है।